Monday, 30 August 2010

प्रतिबिम्ब

सुबह की मद्धम किरणे जब मेरी खिड़की पे पढ़ती हैं,
अंगड़ाई लेती हूँ मैं उन सपनो की रजाई को ओढ़े हुए...
फिर उठकर रखती हूँ ख्यालों को सच करने का ख्वाब,
सामने खड़ी दिनभर के सफ़र करने वाली बस को पकढ़ते हुए.
इस सफ़र में कुछ रंग भरते हैं,
कुछ फीके हो जाते हैं.
कुछ रास्ते छोटे तोह कुछ लम्बे हो जाते हैं.
इस बस का सफ़र चलता रहता है,
संग अपने कदम कदम पे सपनो का इंधन भरता रहता है.
जब सूरज धीरे धीरे झुकने लगता है,
इसके इंधन के धुंए से आसमान का रंग बदलने लगता है.
इस बस से उतारकर जब शाम की नौका पकढ़ते हैं,
दिनभर के सफ़र पर एक नज़र हम करते हैं,
कौन सा पन्ना आज ज़िन्दगी का पढ़ा था दिनभर के सफ़र में,
कौन सा पन्ना लिखा और जोड़ा था अपनी कलम से.
कितने नज़ारे देखे थे उस बस के झरोखे से,
कितनी बातें बाटी थी भिन्न उन चेहरों से.
कर रही हूँ हिसाब शाम की नौका में हो सवार,
देख रही हूँ जवाब और ढूंढ़ रही हूँ सवाल.
कितना जोड़ा, कितना घटाया,
कितना खोया, कितना पाया.
दोनों सफ़र को सामने जब रखती हूँ प्रतिदिन,
मेरी ज़िन्दगी के चित्र को करते हैं यह प्रतिबिम्ब.