
एक साल बीत गया
शाम से रात...रात से सवेरा भी हो गया
याद कैसे नहीं हो वोह दिन
शाम को खबर ऐसे मिली की नहीं हुआ यकीन
बैठा करते थे उस के छज्जे के नीचे
थोड़ा फिरंगी रखते थे अपना अन्द्दाज़
घर पे हाथ से खाते थे उंगलिया चाट ते हुए
वहाँ छूरी काँटों के बिना नहीं करते थे बात
फिरंगी मेमों को देखा करते थे
उनके फैशन को भी खूब छेड़ा करते थे
ओशो की वेशभूषा में जब वोह निकलते
फिर बैठे इसके एक कौने में हर रोज़ एक अजनबी से दोस्ती करते
एक छोटा सा फिरंगिस्तान बन गया था इस जगह
संगीन मुद्दों से लेकर प्रेम के चर्चों से जहाँ करते थे मज़ा
एक याद बन गए हैं अब वोह पल
जब बैठा करते थे घंटों इसके छज्जे के अन्दर
अब जब गुज़रती हूँ इसके गलियारे के पास
ढूंढती हूँ उस छज्जे को जो टूट गया उस धमाके के साथ
पर आज भी मन में रंगती हूँ इस फीकी दूकान को
जहां बैठा करते थे सुबह से शाम को
आज एक साल बीत गया
काम फिर चालु हो गया
एक बार फिर उस छज्जे का तिनका तिनका जोड़ रहे हैं
साथ में उन पलों को दोबारा सजाने की कोशिश कर रहे हैं
सब कुछ बन जायेगा फिर नए जैसा
पर क्या वोह होगा पहले जैसे
मन में विश्वास और हिम्मत लेते हुए
याद करते हैं जो बैठे थे उस दिन वहां
उस धमाके के शोर से अनजान
उनके प्यार के लिए उस जगह को करते हैं पहले जैसा
जैसा छोड़ा था उसको एक साल पहले, बिलकुल वैसा
अब छज्जा नया होगा, होंगे नए चेहरे
पर हम तोह वही हैं जैसे थे पहले
तोह क्यूँ न इस जगह को फिर से वही रंग दे
उस अंदाज़ को लाने के लिए एक दूजे का संग दें.