Thursday, 9 December 2010
अन्तहीन
अंतहीन हैं यह पल जो बनाते हैं इस किताब को
लोगों की बातें हैं अंतहीन सपने हैं कई सारे
ज़मीन पे खड़े आसमान पे नज़र हैं सभी डालें
अन्तहीन है कोशिशों का दौर
अन्तहीन है यह भागम दौड़
हाफ्ते हुए शाम को जब घर हम पहुचें
आँखें बंद कर के सपनो को गिनने बैठे
जब हिसाब देखा तोह खुद से हस के बोली
इनको गिनना है क्यूँ, यह है सपनो की टोली
आज एक कल दूसरा बनेगा
अन्तहीन है यह बस यूँ ही चलता रहेगा.
Tuesday, 5 October 2010
ट्रेन का सफ़र
खिड़की से बहार देखो तोह संग चाँद है.
अलग अलग रंग की मिटटी दिख रही है,
चाँद की चांदनी हर रंग पे बिखर रही है.
जब शहर इस झरोखे से दिखता है,
हजारों सितारों का जगमगाता समूह सा लगता है.
इस दौरान वीराने घर भी न जाने कितने चुप हैं,
दो पल के इस हलचल के शोर से भी खुश हैं.
और क्यूँ न हो इस दो पल के साथ से,
इनको दो पलों की ज़िन्दगी ही मिल जाती है.
और जब यह गाड़ी खोखले रास्तों पे चलती है,
एक अलग सी धुन इसकी चाल से निकलती है.
क्या पक्का है क्या कच्चा है
क्या है सच और क्या है सपना
साथ साथ जब एक और गाड़ी निकलती है
अपनी आवाज़ से कुछ न कुछ कहती है
रास्ते बोहोत हैं और मंजिले भी
चलो इस अकेली राह में ...
एक साथ ये भी और वोह भी सही.
मुस्कुराते हुए बैठे इस अजनबी सफ़र में रहते रहते
कहीं सामने वाला साथी तुम्हे पागल न समझ बैठे.
ट्रेन का यह सफ़र अलग अलग कहानियाँ संग ले चलता है,
इस पटरी पर मेरी कहानी का एक पन्ना बस यूँ ही निकलता है.
Monday, 30 August 2010
प्रतिबिम्ब
अंगड़ाई लेती हूँ मैं उन सपनो की रजाई को ओढ़े हुए...
फिर उठकर रखती हूँ ख्यालों को सच करने का ख्वाब,
सामने खड़ी दिनभर के सफ़र करने वाली बस को पकढ़ते हुए.
इस सफ़र में कुछ रंग भरते हैं,
कुछ फीके हो जाते हैं.
कुछ रास्ते छोटे तोह कुछ लम्बे हो जाते हैं.
इस बस का सफ़र चलता रहता है,
संग अपने कदम कदम पे सपनो का इंधन भरता रहता है.
जब सूरज धीरे धीरे झुकने लगता है,
इसके इंधन के धुंए से आसमान का रंग बदलने लगता है.
इस बस से उतारकर जब शाम की नौका पकढ़ते हैं,
दिनभर के सफ़र पर एक नज़र हम करते हैं,
कौन सा पन्ना आज ज़िन्दगी का पढ़ा था दिनभर के सफ़र में,
कौन सा पन्ना लिखा और जोड़ा था अपनी कलम से.
कितने नज़ारे देखे थे उस बस के झरोखे से,
कितनी बातें बाटी थी भिन्न उन चेहरों से.
कर रही हूँ हिसाब शाम की नौका में हो सवार,
देख रही हूँ जवाब और ढूंढ़ रही हूँ सवाल.
कितना जोड़ा, कितना घटाया,
कितना खोया, कितना पाया.
दोनों सफ़र को सामने जब रखती हूँ प्रतिदिन,
मेरी ज़िन्दगी के चित्र को करते हैं यह प्रतिबिम्ब.
Friday, 30 July 2010
खिड़की
क्षितिज
ऐसे जैसे जब और तब
Tuesday, 22 June 2010
एक झरोखा
Saturday, 17 April 2010
बावरा सा साथ
उस बावरी सी हवा के झोंके ने आँखों पे गिएरती हुई लटों को सुलझा दिया
उस प्यारी सी मुस्कराहट ने इन राहों में मुझको भटका दिया॥
खुशबु सौंधी सौंधी सी महकती है उनके गुजरने पर
शरमा के पलके झुक जाती हैं और यादों में गुज़र जाती है सेहर॥
चारो तरफ ढूंढती हूँ उनका वजूद
आँखों के झपकने पर होंते हैं वोह मौजूद॥
आँखों को खोल कर उस पल को ओझल करने से लगता है डर
हवाओं में उडती हूँ उस एहसास से, लहरा के इस प्यार के पर॥
हाथों में पैगाम वोह दे कर जातें हैं कुछ ऐसे
कुछ ऐसे, कुछ वैसे ,कुछ अपने जैसे॥
कभी कोने मैं बैठे हुए जब वोह अपने आसमान से बातें करतें हैं
उस वक़्त हम चुपके से उन आँखों की चमक से गुफ्तगू करतें हैं ॥
सामने खिडकियों के कोनो में उनकी परछाई मुझे जब दिख जाती है
बारिशों में भी खिड़कियाँ खोलने में मुझे मजबूर कर जाती हैं॥
दो बातों का सहारा ही सही
दो पलों का नज़राना ही सही
बावरी इस तन्हाई में
बावरा सा एक प्यारा सा साथ तुम्हारा ही सही॥
Sunday, 4 April 2010
आवारा राह

उस सुनसान रास्ते पर चलते हुए,
मुझे एक पत्थर मिला..उस पत्थर की गेंद बना कर,
मैंने तन्हाई के कुछ मूक पल गुज़ारे...
अचानक से.....
गोल गोल उलटता पटकता वोह पत्थर उन क़दमों में जा गिरा,
जो कदम इस सुनसान राह में अब मेरे हमराही बन गए हैं,
अब किसी पत्थर की ज़रूरत नहीं,
अब किसी चुप्पी का सहारा नहीं,
अब इन क़दमों को राह मिल गई है ऐसी,
जिस राह में यह दिल आवारा है तोह आवारा ही सही.
Saturday, 27 March 2010
वोह बारिश आज भी याद है मुझे
Friday, 26 February 2010
मेरे ब्लॉग मेरा एहसास
Tuesday, 23 February 2010
अनजान खड़ी हूँ मैं
अगर कुछ नया लिखा है
उस खबर से अनजान खड़ी हूँ मैं
आज इस कमरे के आगे एक
आँगन है खुला खुला सा
उसकी रौशनी से अनजान खड़ी हूँ मैं
इस फुलवारी के बीच खड़ी हूँ
इसकी सुन्दरता को देखती हूँ
पर इसकी खुशबू से अनजान खड़ी हूँ मैं
आज इस भाग्दध में फस गयी हूँ
धक्को के सहारे पहचान रही हूँ
पर इन् बदलते चेहरों से अनजान खड़ी हूँ मैं
आज हवाओं से बातें कर रही हूँ
हवाओं के रुख से सरगम बना रहीं हूँ
पर इस सरगम की धुन से अनजान खड़ी हूँ मैं
आज मैं पानी के रस का मज़ा ले रही हूँ
मन के तूफ़ान को अलविदा कह रहीं हूँ
पर आज भी इस प्यास से अनजान खड़ी हूँ मैं
आज मिठाई की दुकान में
रखें हैं खूब सारे इनाम
इन इनामों की मिठास से अनजान खड़ी हूँ मैं
आज दुनिया किधर ले जा रही है
मेरी मन की सोच को
इस अजीब सी राह से अनजान खड़ी हूँ मैं
आज लिखने को बोहोत सारे हैं नगमे
बोहोत सारे हैं ख्वाब
इन ख़्वाबों के ख्यालों से अनजान खड़ी हूँ मैं
अनजान हूँ कई परिभाषाओं से
परिभाषा के मतलब ढूंढ रहीं हूँ
ढूंढते हुए धीमे से अनजाने से
आखिरकार सब जान रही हूँ मैं !
Monday, 8 February 2010
ख़ुशी किसे कहते हैं

Thursday, 4 February 2010
एक कोशिश
अब तन्हाई भी एक कोशिश बन गयी हैतनहा रहना ही ज़िन्दगी बन गयी हैपर मुझे पता है एक दिन यह तनहा दिल मिलेगा किस्सी सेएक प्यार भरी आवाज़ से बुलाएगा कहीं सेहर रोज़ इस को चाहिए एक साथकोई जो खुश कर दे बन जाता है ख़ासकितना हसीं है यह ज़िन्दगी का रुखहर मोर पे दुःख का साथ देता है सुखयही आशा है इस तनहा दिल कीभले यह सुने सबकी पर करे मनन कीजी ली यह ज़िन्दगी किस्सी का हाथ थामेअब अलग ही परिभाषा बन गयी है मेरे सामनेखुध से प्यार करना है यह सीख लिया है अबयह फैसला करना सीख लिया है की क्या करना है कबकई सारे गम छुपाये हैं इस दिल के अन्दरएक बूँद से अब मनन बन गया है समुन्दरइस समुन्दर को चल्काना नहीं है अबभले इस नौका में सवार हो दो माझी या हो सब!
तुम हो कौन?
तुम हो कौन?जिसको याद करके मुस्कुराते हैं हमएक अजीब रिश्ता है तुमसेएक अजीब ख्वाइश जगाते हो तुमप्यार भरी नज़र से जब देखते हैं आपसब कुछ नज़र आता है साफ़ साफ़जैसे ही लफ्ज़ खुलते हैं चालकाने को अलफ़ाज़शब्दों की सुराही सूख जाती है बन के इक राज़तुम हो कौन जाने कब पता चलेगाक्या यह रिश्ता तब तक बना रहेगा?आज ख़ुशी कहती है हम सेकी यह मुस्कराहट जचती है तुम पेबस यूँ ही रहना मेरे पासऔर चेध्ते रहना वही प्यारा सा साज़तुम्हारी हर एक बात को सुनाने का है इंतज़ारअब पतझड़ के मौसम में लाये हो तुम बहारयह ज़िन्दगी ले आई है फिर उस मोर पेजहाँ मैं पूछती हूँ हर घडी ये सब सेतुम हो कौन कहाँ छुपाया है तुमने अपना वजूद?तुम जो भी हो मन को भा गए हो खूबजिस किताब से फीका पढ़ गया था प्यार का नूरशुक्रिया प्यार से रंग भरने का उसमेमेरे अनजाने हुज़ूर!
इस वक़्त की कुछ बातें
एक दिन बन जाएगी हर बात
आज क्या नया हैक्यूँ छुपा हुआ है?मेरे चेहरे की ख़ुशी के पीचेकुछ दबा हुआ सा है.हवाएं गुज़रती रहती हैंघड़ी घड़ी उडती हुई यादें दिलाती हैंइन हवाओं से लड़ना सीख लिया है मैंनेसांस रोक कर आगे बदना भी सीख लिया है मैंनेज़िन्दगी ऐसे भी बताएगी अपनी पहचानइस सोच को लिए करे थे बड़े एहसानपर क्या थे उनके मायनेअब साफ़ साफ़ खड़े हैं मेरे सामनेज़िन्दगी कम्बक्त है कम्बक्त ही रहेगीहर पल ये सांसें यूँ ही चलती रहेंगीतोह क्यूँ मूह फेरे उन रास्तों सेजहाँ किसी रोज़ खुशियाँ मिलती थी हर बातों मेंआज चमक रहा है वोह आइनाजो बताता था क्या सही है और क्या सही थाएक हलकी सी मुस्कराहट छलकती है होटों सेजब याद आतें हैं वोह लम्हेंजब भरोसा नहीं था खुदी सेआज खुदी और खुदा दोनों है साथ....बस कहते हैं मुझसे, मुस्कुराते रहनादेखना एक दिन बन जाएगी हर बात

