Tuesday, 5 October 2010

ट्रेन का सफ़र

इन डगमगाती हुई राहों में कितनी जान है,
खिड़की से बहार देखो तोह संग चाँद है.
अलग अलग रंग की मिटटी दिख रही है,
चाँद की चांदनी हर रंग पे बिखर रही है.
जब शहर इस झरोखे से दिखता है,
हजारों सितारों का जगमगाता समूह सा लगता है.
इस दौरान वीराने घर भी न जाने कितने चुप हैं,
दो पल के इस हलचल के शोर से भी खुश हैं.
और क्यूँ न हो इस दो पल के साथ से,
इनको दो पलों की ज़िन्दगी ही मिल जाती है.
और जब यह गाड़ी खोखले रास्तों पे चलती है,
एक अलग सी धुन इसकी चाल से निकलती है.
क्या पक्का है क्या कच्चा है
क्या है सच और क्या है सपना
साथ साथ जब एक और गाड़ी निकलती है
अपनी आवाज़ से कुछ न कुछ कहती है
रास्ते बोहोत हैं और मंजिले भी
चलो इस अकेली राह में ...
एक साथ ये भी और वोह भी सही.
मुस्कुराते हुए बैठे इस अजनबी सफ़र में रहते रहते
कहीं सामने वाला साथी तुम्हे पागल न समझ बैठे.
ट्रेन का यह सफ़र अलग अलग कहानियाँ संग ले चलता है,
इस पटरी पर मेरी कहानी का एक पन्ना बस यूँ ही निकलता है.

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