Thursday, 9 December 2010

अन्तहीन

ज़िन्दगी के पन्नों को टटोलो तो समझ आता है एक सच
अंतहीन हैं यह पल जो बनाते हैं इस किताब को
लोगों की बातें हैं अंतहीन सपने हैं कई सारे
ज़मीन पे खड़े आसमान पे नज़र हैं सभी डालें
अन्तहीन है कोशिशों का दौर
अन्तहीन है यह भागम दौड़
हाफ्ते हुए शाम को जब घर हम पहुचें
आँखें बंद कर के सपनो को गिनने बैठे
जब हिसाब देखा तोह खुद से हस के बोली
इनको गिनना है क्यूँ, यह है सपनो की टोली
आज एक कल दूसरा बनेगा
अन्तहीन है यह बस यूँ ही चलता रहेगा.