Saturday, 17 April 2010

बावरा सा साथ

उस बावरी सी हवा के झोंके ने आँखों पे गिएरती हुई लटों को सुलझा दिया

उस प्यारी सी मुस्कराहट ने इन राहों में मुझको भटका दिया॥

खुशबु सौंधी सौंधी सी महकती है उनके गुजरने पर

शरमा के पलके झुक जाती हैं और यादों में गुज़र जाती है सेहर॥

चारो तरफ ढूंढती हूँ उनका वजूद

आँखों के झपकने पर होंते हैं वोह मौजूद॥

आँखों को खोल कर उस पल को ओझल करने से लगता है डर

हवाओं में उडती हूँ उस एहसास से, लहरा के इस प्यार के पर॥

हाथों में पैगाम वोह दे कर जातें हैं कुछ ऐसे

कुछ ऐसे, कुछ वैसे ,कुछ अपने जैसे॥

कभी कोने मैं बैठे हुए जब वोह अपने आसमान से बातें करतें हैं

उस वक़्त हम चुपके से उन आँखों की चमक से गुफ्तगू करतें हैं ॥

सामने खिडकियों के कोनो में उनकी परछाई मुझे जब दिख जाती है

बारिशों में भी खिड़कियाँ खोलने में मुझे मजबूर कर जाती हैं॥

दो बातों का सहारा ही सही

दो पलों का नज़राना ही सही

बावरी इस तन्हाई में

बावरा सा एक प्यारा सा साथ तुम्हारा ही सही॥

Sunday, 4 April 2010

आवारा राह



उस सुनसान रास्ते पर चलते हुए,


मुझे एक पत्थर मिला..उस पत्थर की गेंद बना कर,


मैंने तन्हाई के कुछ मूक पल गुज़ारे...


अचानक से.....


गोल गोल उलटता पटकता वोह पत्थर उन क़दमों में जा गिरा,


जो कदम इस सुनसान राह में अब मेरे हमराही बन गए हैं,


अब किसी पत्थर की ज़रूरत नहीं,


अब किसी चुप्पी का सहारा नहीं,


अब इन क़दमों को राह मिल गई है ऐसी,


जिस राह में यह दिल आवारा है तोह आवारा ही सही.