Wednesday, 4 April 2012

निन्दिया

आँखों की बस्ती सपनो से भर गयी है
रात की चादर से इसकी छत ढक गयी है


छोटी सी कुटिया है आँखों की
लेकिन अनगिनत सपने बसे हैं इसमें


सपनो के रंगमंच पे आज क्या जादू दिखेगा
न जाने कौन सा किरदार मन के किस कोने से कब टपकेगा


होश की लालटेन जल बुझ रही है
क्यूंकि निंदिया हवा का झूला झूल रही है


आजा निंदिया बस जा इस बस्ती में
ले जा कहीं दूर सपनो की कश्ती में 



सोच

यूँ ही एक दिन धुप में बैठे 
सोच को बुन रही थी
तो कुछ फंदे छोटे तो कुछ बड़े बन गए
सोचा था की एक स्वेअटर बुन सकुंगी 
मगर यह तो कोई फटा रुमाल सा दिख रहा है 
तब लगा सोच एक जैसी रखना कितना ज़रूरी है 

काश उढ़ पाती मैं

काश उढ़ पाती मै
हवा के झोंकों से लड़ पाती मैं
पंखों में कंकड़ फस्से हैं
या थोड़े झड से गए हैं
जानता है जो इन्हें तिनको की तरह तोढ़कर ज़मीन पे फेंक रहा है
उसे क्या पता यह पंछी फडफडाता क्यों है
उसे क्या पता यह पंछी उड़ना चाहता क्यों है
कोशिश करता रहा उढने की मगर 
उसकी मंजिल दो कदम और दूर हो गयी  

ज़िन्दगी बहुत कमीनी है

हाथ लगाओ तो गला पकड़ लेती है
इसको समझाना मुश्किल है
बहुत ही खुद्दार है, अपनी मनमानी करती है
ज्यादा फिक्र करो इसकी तो हाथ से छूटने लगती है
समझाने पर आफत बन पढ़ती है


ज़िन्दगी बहुत कमीनी है
शायद इतनी भी नहीं
चुपचाप अगर बैठो तो इसकी आवाज़  सुन सकोगे
शांत रह कर ही इसकी बात समझ पाओगे 
फिर पता चलेगा की इस ज़िन्दगी को कमीना बनाने वाला आखिर कौन है.
खुद से पूछो.