Friday, 26 February 2010

मेरे ब्लॉग मेरा एहसास



क्या है यह एहसास


मेरे दिल की है यह आवाज़


सुनाती हूँ मैं इन पन्नों में


अपने दिल के कुछ राज़


मिलाने अपने सुर और साज़


चाहिए आपका प्यारा सा साथ


तोह पढ़िए और सुनिए


और बनिए मेरे हमराज़


क्यूंकि ज़िन्दगी का हर एक लम्हा है ख़ास


और इसको जीने के लिए चाहिए एक एहसास!


कहा था मैंने वक़्त को थम ना जाना

कहा था मैंने यादों को मत गुनगुनाना


आज सब कुछ जो माँगा था ज़िन्दगी से

वोह मिल रहा है धीमे धीमे से


न जाने कहाँ से एक हवा का झोंका आया

हज़ारों सपने अपने संग लाया


न जाने कहाँ से आई वोह रौशनी

जिसने भरी अँधेरी राहों में खुशी


न जाने कहाँ से आई वोह मुस्कराहट

जो छलकती है जब सुनती है उनकी आहात


न जाने कहाँ से आई वोह धुन

जो कहती है मुझसे 'अपने दिल की सुन'


न जाने कहाँ से आया है यह होसला

जो कराता है खुद से फैसला


न जाने कहाँ से आये हो तुम यहाँ

तुमने बना दिया है एक अलग ही जहाँ


पर इतना भला तोह जाना है इस सब से

यह रिश्ता तोह बनता है कुछ तुम से कुछ हम से

Tuesday, 23 February 2010

अनजान खड़ी हूँ मैं






अखबारों के पन्नों में
अगर कुछ नया लिखा है
उस खबर से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज इस कमरे के आगे एक
आँगन है खुला खुला सा
उसकी रौशनी से अनजान खड़ी हूँ मैं



इस फुलवारी के बीच खड़ी हूँ
इसकी सुन्दरता को देखती हूँ
पर इसकी खुशबू से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज इस भाग्दध में फस गयी हूँ
धक्को के सहारे पहचान रही हूँ
पर इन् बदलते चेहरों से अनजान खड़ी हूँ मैं

आज हवाओं से बातें कर रही हूँ
हवाओं के रुख से सरगम बना रहीं हूँ
पर इस सरगम की धुन से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज मैं पानी के रस का मज़ा ले रही हूँ
मन के तूफ़ान को अलविदा कह रहीं हूँ
पर आज भी इस प्यास से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज मिठाई की दुकान में
रखें हैं खूब सारे इनाम
इन इनामों की मिठास से अनजान खड़ी हूँ मैं

आज दुनिया किधर ले जा रही है
मेरी मन की सोच को
इस अजीब सी राह से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज लिखने को बोहोत सारे हैं नगमे
बोहोत सारे हैं ख्वाब
इन ख़्वाबों के ख्यालों से अनजान खड़ी हूँ मैं

अनजान हूँ कई परिभाषाओं से
परिभाषा के मतलब ढूंढ रहीं हूँ
ढूंढते हुए धीमे से अनजाने से
आखिरकार सब जान रही हूँ मैं !

Monday, 8 February 2010

ख़ुशी किसे कहते हैं


जब सूरज की किरने पढ़ती हैं ओस पर
जब फूल खिलते हैं सूखी डाली पर
जब लहलहाती है खेत की हरियाली
जब कोयल गए बैठे डाली डाली
ख़ुशी इसे कहते हैं!

जब भूख में दे कोई अन्न का सहारा
प्यास में बहती नदी का किनारा
सुख में दे किरने उल्लास की
दुःख में उठाये नज़रें आस की
ख़ुशी इसे कहते हैं!
जब लक्ष्य हो पास तुम्हारा
और उसमें अनंत हर्ष का सहारा
धैर्य की चाबी थामें हाथो में
जब खोले सुनहरे दरवाज़े किस्मत के
ख़ुशी इसे कहते हैं!
बने वोह बुढ़ापे की लाठी
दो बातें जो उन लोगो से बाटी
देना अपना वक़्त उन पुराने नगमो को
जो अब भी याद करते हैं उन् पराये अपनों को
उनकी हस्सी में अपनी हस्सी शामिल करने को
मेरे दोस्त ख़ुशी इसे कहते हैं!

Thursday, 4 February 2010

एक कोशिश









अब तन्हाई भी एक कोशिश बन गयी है

तनहा रहना ही ज़िन्दगी बन गयी है

पर मुझे पता है एक दिन यह तनहा दिल मिलेगा किस्सी से

एक प्यार भरी आवाज़ से बुलाएगा कहीं से

हर रोज़ इस को चाहिए एक साथ

कोई जो खुश कर दे बन जाता है ख़ास

कितना हसीं है यह ज़िन्दगी का रुख

हर मोर पे दुःख का साथ देता है सुख

यही आशा है इस तनहा दिल की

भले यह सुने सबकी पर करे मनन की

जी ली यह ज़िन्दगी किस्सी का हाथ थामे

अब अलग ही परिभाषा बन गयी है मेरे सामने

खुध से प्यार करना है यह सीख लिया है अब

यह फैसला करना सीख लिया है की क्या करना है कब

कई सारे गम छुपाये हैं इस दिल के अन्दर

एक बूँद से अब मनन बन गया है समुन्दर

इस समुन्दर को चल्काना नहीं है अब

भले इस नौका में सवार हो दो माझी या हो सब!



तुम हो कौन?

तुम हो कौन?
जिसको याद करके मुस्कुराते हैं हम
एक अजीब रिश्ता है तुमसे
एक अजीब ख्वाइश जगाते हो तुम

प्यार भरी नज़र से जब देखते हैं आप
सब कुछ नज़र आता है साफ़ साफ़
जैसे ही लफ्ज़ खुलते हैं चालकाने को अलफ़ाज़
शब्दों की सुराही सूख जाती है बन के इक राज़

तुम हो कौन जाने कब पता चलेगा
क्या यह रिश्ता तब तक बना रहेगा?
आज ख़ुशी कहती है हम से
की यह मुस्कराहट जचती है तुम पे

बस यूँ ही रहना मेरे पास
और चेध्ते रहना वही प्यारा सा साज़
तुम्हारी हर एक बात को सुनाने का है इंतज़ार
अब पतझड़ के मौसम में लाये हो तुम बहार

यह ज़िन्दगी ले आई है फिर उस मोर पे
जहाँ मैं पूछती हूँ हर घडी ये सब से
तुम हो कौन कहाँ छुपाया है तुमने अपना वजूद?
तुम जो भी हो मन को भा गए हो खूब

जिस किताब से फीका पढ़ गया था प्यार का नूर
शुक्रिया प्यार से रंग भरने का उसमे
मेरे अनजाने हुज़ूर!

इस वक़्त की कुछ बातें


इस वक़्त को गुजरने दो ज़रा
वक़्त की साँसों को बड़ने दो ज़रा
ज़िन्दगी इस वक़्त में गुज़र जाये न
ऐसे पागलपन से बचने दो ज़रा
क्या यही चाह रह गयी थी
सब जान कर भी अनजान बन गयी थी
जिन से हर पल का हिसाब रखते थे
आज उनसे अलग अपनी पहचान बन गयी!

एक दिन बन जाएगी हर बात

आज क्या नया है
क्यूँ छुपा हुआ है?
मेरे चेहरे की ख़ुशी के पीचे
कुछ दबा हुआ सा है.

हवाएं गुज़रती रहती हैं
घड़ी घड़ी उडती हुई यादें दिलाती हैं

इन हवाओं से लड़ना सीख लिया है मैंने
सांस रोक कर आगे बदना भी सीख लिया है मैंने
ज़िन्दगी ऐसे भी बताएगी अपनी पहचान
इस सोच को लिए करे थे बड़े एहसान
पर क्या थे उनके मायने
अब साफ़ साफ़ खड़े हैं मेरे सामने

ज़िन्दगी कम्बक्त है कम्बक्त ही रहेगी
हर पल ये सांसें यूँ ही चलती रहेंगी
तोह क्यूँ मूह फेरे उन रास्तों से
जहाँ किसी रोज़ खुशियाँ मिलती थी हर बातों में

आज चमक रहा है वोह आइना
जो बताता था क्या सही है और क्या सही था
एक हलकी सी मुस्कराहट छलकती है होटों से
जब याद आतें हैं वोह लम्हें
जब भरोसा नहीं था खुदी से

आज खुदी और खुदा दोनों है साथ....
बस कहते हैं मुझसे, मुस्कुराते रहना
देखना एक दिन बन जाएगी हर बात