Friday, 30 July 2010

खिड़की

जब मैंने किस्सी से पूछा अँधेरा क्या होता है
इन सलाखों ने मुझे बता दिया
जब मैंने किस्सी से पूछा सन्नाटा क्या होता है
इस तन्हाई ने मुझे बता दिया
जब मैंने किस्सी से पूछा डर क्या होता है
हथेल्यों पे पढ़े निशानों ने मुझे बता दिया
जब मैंने किस्सी से पूछा माँ क्या होती है
उसके आँचल की याद ने मुझे बता दिया
जब मैंने किस्सी से पूछा कठिनाइयाँ क्या होती है
इन जंजीरों ने मुझे बता दिया
आखिरी बार जब मैंने किस्सी से पूछा ज़िन्दगी क्या होती है
कोठरी की खिड़की से आती सूरज की किरणों ने मुझे समझा दिया

क्षितिज

एक ज़िन्दगी की खोज में जब वोह माझी चला चलता है,
ज़िन्दगी को सागर के तूफ़ान से मानो मिलाने चलता है.
नौका में बैठ के न जाने वोह सोचता है क्या
वापिस अपनी जीवन की नौका में बैठ पाउँगा क्या?
इस सफ़र में जब लहरों का लगता है जोर,
तोह माझी बटोर के पूरी हिम्मत, थामे रखता है अपनी नौका की डोर.
छोड़ता है धरती, पर धैर्य बनाये रखता है ,
फिर जीने की चाह से अपनी नौका थामे रखता है.
नौका चलाये यह माझी सागर के क्रोध से येह लड़ता है,
क्षितिज से मिलने की आस से लहरों से ना डरता है.
जब गहरे समुन्दर की शान्ति से यह माझी आख़िरकार जा मिलता है,
हवा की शोर उसकी इस सफलता पर तालियों से उसका स्वागत करता है.
जब हौसला हो क्षितिज पाने का आर हिम्मत हो बुलंद,
मन में हो दृढ़ता और जीने की उमंग.
तो हो जाता है हर लक्ष्य आसान,
भले यह हो क्षितिज पाने का भी अरमान.

ऐसे जैसे जब और तब

जब हवाओं में तेज़ी हो ऐसी
जिस से सरसों लहलहाए पीली चूनर जैसी.
कैसा लगता है जब वोह पंछी टकराता है नदी से
सोती नदिया को मीठी निंदिया से जगाता हो जैसे.
भवरों का शोर जब मिलता है फूलों से ऐसे
इस बहार के रंगों में आँख मिचोली खेलता हो जैसे.
जब पत्तों की सरगम मल्हार गा रही हो ऐसे
उनमें छिपे घोसलों को लोरियां सुना रही हो जैसे.
सूरज तेज़ मुस्कराहट दिखाता है जब
लगता है चाँद की ठंडक समझा रहा हो तब.
बारिश में भीगी हुई मिटटी की खुशबू आती है जब
खोये हुए हमारे दिलों को अपनी धरती से मिलाती है तब.