Friday, 30 July 2010

खिड़की

जब मैंने किस्सी से पूछा अँधेरा क्या होता है
इन सलाखों ने मुझे बता दिया
जब मैंने किस्सी से पूछा सन्नाटा क्या होता है
इस तन्हाई ने मुझे बता दिया
जब मैंने किस्सी से पूछा डर क्या होता है
हथेल्यों पे पढ़े निशानों ने मुझे बता दिया
जब मैंने किस्सी से पूछा माँ क्या होती है
उसके आँचल की याद ने मुझे बता दिया
जब मैंने किस्सी से पूछा कठिनाइयाँ क्या होती है
इन जंजीरों ने मुझे बता दिया
आखिरी बार जब मैंने किस्सी से पूछा ज़िन्दगी क्या होती है
कोठरी की खिड़की से आती सूरज की किरणों ने मुझे समझा दिया

4 comments:

  1. वाह क्या बात है. सुंदर एहसास.

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  2. बहुत सुन्दर ...

    ********************
    छोड़ दे माँ - बाप को किसी के लिए ?
    http://sometimesinmyheart.blogspot.com/2010/08/blog-post_27.html

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