Friday, 30 July 2010

क्षितिज

एक ज़िन्दगी की खोज में जब वोह माझी चला चलता है,
ज़िन्दगी को सागर के तूफ़ान से मानो मिलाने चलता है.
नौका में बैठ के न जाने वोह सोचता है क्या
वापिस अपनी जीवन की नौका में बैठ पाउँगा क्या?
इस सफ़र में जब लहरों का लगता है जोर,
तोह माझी बटोर के पूरी हिम्मत, थामे रखता है अपनी नौका की डोर.
छोड़ता है धरती, पर धैर्य बनाये रखता है ,
फिर जीने की चाह से अपनी नौका थामे रखता है.
नौका चलाये यह माझी सागर के क्रोध से येह लड़ता है,
क्षितिज से मिलने की आस से लहरों से ना डरता है.
जब गहरे समुन्दर की शान्ति से यह माझी आख़िरकार जा मिलता है,
हवा की शोर उसकी इस सफलता पर तालियों से उसका स्वागत करता है.
जब हौसला हो क्षितिज पाने का आर हिम्मत हो बुलंद,
मन में हो दृढ़ता और जीने की उमंग.
तो हो जाता है हर लक्ष्य आसान,
भले यह हो क्षितिज पाने का भी अरमान.

No comments:

Post a Comment