Wednesday, 4 April 2012

निन्दिया

आँखों की बस्ती सपनो से भर गयी है
रात की चादर से इसकी छत ढक गयी है


छोटी सी कुटिया है आँखों की
लेकिन अनगिनत सपने बसे हैं इसमें


सपनो के रंगमंच पे आज क्या जादू दिखेगा
न जाने कौन सा किरदार मन के किस कोने से कब टपकेगा


होश की लालटेन जल बुझ रही है
क्यूंकि निंदिया हवा का झूला झूल रही है


आजा निंदिया बस जा इस बस्ती में
ले जा कहीं दूर सपनो की कश्ती में 



No comments:

Post a Comment