Saturday, 27 March 2010

वोह बारिश आज भी याद है मुझे

उस बारिश के मज़े लेते हुए हम दोनों जा बैठे उस छज्जे के नीचे
पीछे से एक अजनबी सी हवा आई
पीछे देखा तो वोह खड़ी हुई थी
उसने धीमे से मुस्कुराया
आज कई दिन बीत गए हैं
आज फिर से बारिश हुई
मैं उस छज्जे के सामने से अकेलेपन में गुज़री
बिना इधर उधर देखते हुए उधर जा पहुंची
जब होश आया तो उन दोनों को साथ मुस्कुराते देखा
आज उसकी मुस्कराहट के मायने बदलते हुए दिखाई दिए
आज इल्म हुआ मुझे हकीकत का
उस हवा के झोंके ने मुझको हमारे छज्जे के नीचे खड़े खड़े
अजनबी बना डाला
अच्छा है यह बारिश का मौसम
जो बताता है सिर्फ इन बूंदों की खुशबू और इनका रंग
नहीं बताता फर्क कोई इनके भाव का
यह बूँदें एक ही लगती हैं चाहे
आसमान से निकली हों या आँखों से

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