Tuesday, 22 June 2010

एक झरोखा

मुझे आज भी याद है, वह रेत पे दबे हुए पैर
मुझे आज भी याद है वह हरे पेढों कीछाओं
जो एक हार जैसी सजी थी उस रेत के कोनों में
हर रंग उस सागर में नज़र आ रहा था
हर रंग का सपना...हर रंग जैसे हो अपना...
वह रंग उस साहिल को छूकर बेरंग सा हो रहा था
संग अपने हज़ारों सिप्पियों का जीवन बो रहा था॥
ऊपर नीचे उस मधुर सागर की लहरें
जैसे धड़कन के साज़ हमसे हो कुछ कह रहे॥
हवाओं में थी कुछ खुशबू सौंधी नमी की
बूंदों के छीटो से इशारे कुछ कर रही॥
दूर से वह माझी पैगाम कुछ ऐसा दे जाता
इन लहरों का सच मानो बस वह ही हो जानता॥
मैंने तो उस सागर को अपने सपनों के गागर में झट से भर लिया
सच तोह सच है जिसमें मुझे उस सागर ने पिरो दिया॥
इतना सुन्दर झरोखा था जो मैंने देखा
जब याद आता है वह दिलाता है एक एहसास ख़ुशी का॥

4 comments:

  1. हिन्दी ब्लाग जगत में आपका स्वागत है। कविताएं हृदयस्पर्शी है।आभार!

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  2. सुंदर.....स्वागतम..

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  3. "दूर से वह माझी पैगाम कुछ ऐसा दे जाता
    इन लहरों का सच मानो बस वह ही हो जानता॥"
    सुंदर शब्द और भावों से सजा "एक झरोखा" अच्छा लगा.

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  4. hey aakansha hi,,,,,,i dnt knw tat u to have ur blogname as ehsaas,,,,i liked ur poetry ,,,,,,

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