जब हवाओं में तेज़ी हो ऐसी
जिस से सरसों लहलहाए पीली चूनर जैसी.
कैसा लगता है जब वोह पंछी टकराता है नदी से
सोती नदिया को मीठी निंदिया से जगाता हो जैसे.
भवरों का शोर जब मिलता है फूलों से ऐसे
इस बहार के रंगों में आँख मिचोली खेलता हो जैसे.
जब पत्तों की सरगम मल्हार गा रही हो ऐसे
उनमें छिपे घोसलों को लोरियां सुना रही हो जैसे.
सूरज तेज़ मुस्कराहट दिखाता है जब
लगता है चाँद की ठंडक समझा रहा हो तब.
बारिश में भीगी हुई मिटटी की खुशबू आती है जब
खोये हुए हमारे दिलों को अपनी धरती से मिलाती है तब.
सुन्दर अभिव्यक्ति, बधाई
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