Tuesday, 23 February 2010

अनजान खड़ी हूँ मैं






अखबारों के पन्नों में
अगर कुछ नया लिखा है
उस खबर से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज इस कमरे के आगे एक
आँगन है खुला खुला सा
उसकी रौशनी से अनजान खड़ी हूँ मैं



इस फुलवारी के बीच खड़ी हूँ
इसकी सुन्दरता को देखती हूँ
पर इसकी खुशबू से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज इस भाग्दध में फस गयी हूँ
धक्को के सहारे पहचान रही हूँ
पर इन् बदलते चेहरों से अनजान खड़ी हूँ मैं

आज हवाओं से बातें कर रही हूँ
हवाओं के रुख से सरगम बना रहीं हूँ
पर इस सरगम की धुन से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज मैं पानी के रस का मज़ा ले रही हूँ
मन के तूफ़ान को अलविदा कह रहीं हूँ
पर आज भी इस प्यास से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज मिठाई की दुकान में
रखें हैं खूब सारे इनाम
इन इनामों की मिठास से अनजान खड़ी हूँ मैं

आज दुनिया किधर ले जा रही है
मेरी मन की सोच को
इस अजीब सी राह से अनजान खड़ी हूँ मैं



आज लिखने को बोहोत सारे हैं नगमे
बोहोत सारे हैं ख्वाब
इन ख़्वाबों के ख्यालों से अनजान खड़ी हूँ मैं

अनजान हूँ कई परिभाषाओं से
परिभाषा के मतलब ढूंढ रहीं हूँ
ढूंढते हुए धीमे से अनजाने से
आखिरकार सब जान रही हूँ मैं !

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